Tuesday, February 25, 2014

शब्दों की गुत्थमगुत्थी

शब्दों  की  गुत्थमगुत्थी  मैं, यूँ  न   उलझाओ ,
बह  जाने  दो मुझे ....... भावों   की  सरिता में।
होंगे तुम अथाह  सागर बेइन्तहा  मोहब्बत के ,
में बारिश कि पहली बूँद, चाहत बनी चाकोर की। 
तुम वाह -वाही लूटने वाले शेर, कथा कहने वाले लेख ,
में कविता सादगी भरी, में ही  ग़ज़ल तेरे अधरों की।
में हवा का झोंका हूँ , तूफ़ान भी हिला न पाएगा ,
गगन सी ऊंचाइयों पर रहकर भला .......
धरती से मिलन कैसे कर पाओगे ??????


4 टिप्पणियाँ:

Yashwant Yash said...

बहुत ही बढ़िया



सादर

Dimple Maheshwari said...

Thank you

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Ranjana Verma said...

बहुत सुंदर.....