Wednesday, March 3, 2010

होली


वो कैसे खेले होली..?
जिसका खो गया हमझोली...
क्यों न चल पाया..,
साथ कदम सात..
जाते जाते ये तो..,
बताता जा उसे एक बात
वो कैसे खेले होली..?
जिसका खो गया हमझोली...
क्यों वो रह गयी अकेली?
उसका कहाँ गया हमझोली?
वो कैसे खेले होली..?
जिसका खो गया हमझोली...
कल तलक जो
रंगों से थी रंगी
आज क्यों
आंसुओ में हैं भीगी ?
वो कैसे खेले होली..?
जिसका खो गया हमझोली...
खुशियों से सराबोर थी
जिसको टोली
आज क्यों सुनी सुनी सी हैं
उसकी झोली?
वो कैसे खेले होली..?
जिसका खो गया हमझोली...!!

10 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
सुंदर रचना....

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

कमलेश वर्मा said...

dimpal ji ..aapki lekhni ki utkrisht rchna ...bdhayee

bharat kumar maheshwari said...

>>>>>>>>>>>>>>>>>>

रचना दीक्षित said...

सुंदर रचना शुभकामनायें

Suman said...

nice

अजनबी said...

bahoot khoob....

अजनबी said...

बहुत सताते हैं रिश्ते जो टूट जाते हैं
खुदा किसी को भी तौफीक-ऐ-आशनाई न दे

मैं सारी उम्र अंधेरों में काट सकता हूँ
मेरे दीयों को मगर रौशनी पराई न दे

अजनबी said...

हम ग़ज़ल में तेरा चर्चा नहीं होने देते
तेरी यादों को भी रुसवा नहीं होने देते

sandeepprajapati said...

हार्दिक धन्यवाद मेरे जैसे नवागंतुको का स्वागत करने और मार्गदर्शन करने के लिए,
अभी इस लायक नही हून की आपकी रचना पर कोई टिप्पणी दे सकूँ
लेकिन जितना भी समझ मे आया अतिउत्तम रचना